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भारत पाकिस्तान कश्मीर विवाद: तुर्किये के राष्ट्रपति ने UN में मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया, भारत का कड़ा विरोध

तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को उठाया ह

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एर्दोगन ने 2019 से 6 बार उठाया कश्मीर का मुद्दा: क्या है इसके पीछे की वजह?

तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को उठाया है। एर्दोगन ने अपने संबोधन में कहा कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच एक ज्वलंत मुद्दा है और इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने दोनों देशों से अपील की कि वे बातचीत और सहयोग के माध्यम से इस समस्या का हल निकालें और इसके लिए यूएनएससी की मदद लें। यह 2019 के बाद से छठी बार है जब एर्दोगन ने यूएन के मंच पर कश्मीर का मुद्दा उठाया है।


एर्दोगन का यह बयान भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती है। भारत ने हमेशा से यह रुख अपनाया है कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है और इसमें किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। भारत सरकार ने एर्दोगन के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है और कहा है कि तुर्किये को भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं और इस मामले में तुर्किये का बयान पूरी तरह से अस्वीकार्य है। उन्होंने यह भी कहा कि तुर्किये को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का समर्थन करना चाहिए, न कि ऐसे मुद्दों को उठाना चाहिए।


एर्दोगन के बार-बार कश्मीर मुद्दा उठाने के पीछे कई कारण हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि एर्दोगन खुद को इस्लामिक दुनिया का नेता साबित करना चाहते हैं और कश्मीर मुद्दे को उठाकर मुस्लिम देशों में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं। इसके अलावा, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच घनिष्ठ संबंध हैं, और एर्दोगन पाकिस्तान का समर्थन करते रहे हैं। हालांकि, भारत के साथ तुर्किये के व्यापारिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं, और इस तरह के बयान दोनों देशों के संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।


एर्दोगन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत G20 जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने रुख को दृढ़ता से प्रस्तुत करे और तुर्किये जैसे देशों को स्पष्ट संदेश दे। भारत ने पहले भी तुर्किये को यह स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर मुद्दा पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है और इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र में एर्दोगन का बयान एक बार फिर यह साबित करता है कि कश्मीर मुद्दा अभी भी कुछ देशों के लिए एक राजनीतिक हथियार बना हुआ है। भारत को इस तरह के बयानों का कूटनीतिक रूप से मुकाबला करना होगा और दुनिया को यह समझाना होगा कि कश्मीर में स्थिति सामान्य है और यह भारत का आंतरिक मामला है।


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